गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015
बुधवार, 21 अक्टूबर 2015
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015
Quote's of chanakay (चाणक्य के अनमोल वचन )
Quote 1: ऋण, शत्रु और रोग को समाप्त कर देना चाहिए।
Quote 2: वन की अग्नि चन्दन की लकड़ी को भी जला देती है अर्थात दुष्ट व्यक्ति किसी का भी अहित कर सकते है।
Quote 3: शत्रु की दुर्बलता जानने तक उसे अपना मित्र बनाए रखें।
Quote 4: सिंह भूखा होने पर भी तिनका नहीं खाता।
Quote 5: एक ही देश के दो शत्रु परस्पर मित्र होते है।
Quote 6: आपातकाल में स्नेह करने वाला ही मित्र होता है।
Quote 7: मित्रों के संग्रह से बल प्राप्त होता है।
Quote 8: जो धैर्यवान नहीं है, उसका न वर्तमान है न भविष्य।
Quote 9: संकट में बुद्धि ही काम आती है।
Quote 10: लोहे को लोहे से ही काटना चाहिए।
Quote 11: यदि माता दुष्ट है तो उसे भी त्याग देना चाहिए।
Quote 12: यदि स्वयं के हाथ में विष फ़ैल रहा है तो उसे काट देना चाहिए।
Quote 13: सांप को दूध पिलाने से विष ही बढ़ता है, न की अमृत।
Quote 14: एक बिगड़ैल गाय सौ कुत्तों से ज्यादा श्रेष्ठ है। अर्थात एक विपरीत स्वाभाव का परम हितैषी व्यक्ति, उन सौ लोगों से श्रेष्ठ है जो आपकी चापलूसी करते है।
Quote 15: कल के मोर से आज का कबूतर भला। अर्थात संतोष सब बड़ा धन है।
Quote 16: आग सिर में स्थापित करने पर भी जलाती है। अर्थात दुष्ट व्यक्ति का कितना भी सम्मान कर लें, वह सदा दुःख ही देता है।
Quote 17: अन्न के सिवाय कोई दूसरा धन नहीं है।
Quote 18: भूख के समान कोई दूसरा शत्रु नहीं है।
Quote 19: विद्या ही निर्धन का धन है।
Quote 20: विद्या को चोर भी नहीं चुरा सकता।
Quote 21: शत्रु के गुण को भी ग्रहण करना चाहिए।
Quote 22: अपने स्थान पर बने रहने से ही मनुष्य पूजा जाता है।
Quote 23: सभी प्रकार के भय से बदनामी का भय सबसे बड़ा होता है।
Quote 24: किसी लक्ष्य की सिद्धि में कभी शत्रु का साथ न करें।
Quote 25: आलसी का न वर्तमान होता है, न भविष्य।
Quote 26: सोने के साथ मिलकर चांदी भी सोने जैसी दिखाई पड़ती है अर्थात सत्संग का प्रभाव मनुष्य पर अवश्य पड़ता है।
Quote 27: ढेकुली नीचे सिर झुकाकर ही कुँए से जल निकालती है। अर्थात कपटी या पापी व्यक्ति सदैव मधुर वचन बोलकर अपना काम निकालते है।
Quote 28: सत्य भी यदि अनुचित है तो उसे नहीं कहना चाहिए।
Quote 29: समय का ध्यान नहीं रखने वाला व्यक्ति अपने जीवन में निर्विघ्न नहीं रहता।
Quote 30: जो जिस कार्ये में कुशल हो उसे उसी कार्ये में लगना चाहिए।
Quote 31: दोषहीन कार्यों का होना दुर्लभ होता है।
Quote 32: किसी भी कार्य में पल भर का भी विलम्ब न करें।
Quote 33: चंचल चित वाले के कार्य कभी समाप्त नहीं होते।
Quote 34: पहले निश्चय करिएँ, फिर कार्य आरम्भ करें।
Quote 35: भाग्य पुरुषार्थी के पीछे चलता है।
Quote 36: अर्थ, धर्म और कर्म का आधार है।
Quote 37: शत्रु दण्डनीति के ही योग्य है।
Quote 38: कठोर वाणी अग्निदाह से भी अधिक तीव्र दुःख पहुंचाती है।
Quote 39: व्यसनी व्यक्ति कभी सफल नहीं हो सकता।
Quote 40: शक्तिशाली शत्रु को कमजोर समझकर ही उस पर आक्रमण करे।
Quote 41: अपने से अधिक शक्तिशाली और समान बल वाले से शत्रुता न करे।
Quote 42: मंत्रणा को गुप्त रखने से ही कार्य सिद्ध होता है।
Quote 43: योग्य सहायकों के बिना निर्णय करना बड़ा कठिन होता है।
Quote 44: एक अकेला पहिया नहीं चला करता।
Quote 45: अविनीत स्वामी के होने से तो स्वामी का न होना अच्छा है।
Quote 46: जिसकी आत्मा संयमित होती है, वही आत्मविजयी होता है।
Quote 47: स्वभाव का अतिक्रमण अत्यंत कठिन है।
Quote 48: धूर्त व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की सेवा करते हैं।
Quote 49: कल की हज़ार कौड़ियों से आज की एक कौड़ी भली। अर्थात संतोष सबसे बड़ा धन है।
Quote 50: दुष्ट स्त्री बुद्धिमान व्यक्ति के शरीर को भी निर्बल बना देती है।
चाणक्य (Chanakya)
Quote 51: आग में आग नहीं डालनी चाहिए। अर्थात क्रोधी व्यक्ति को अधिक क्रोध नहीं दिलाना चाहिए।
Quote 52: मनुष्य की वाणी ही विष और अमृत की खान है।
Quote 53: दुष्ट की मित्रता से शत्रु की मित्रता अच्छी होती है।
Quote 54: दूध के लिए हथिनी पालने की जरुरत नहीं होती। अर्थात आवश्कयता के अनुसार साधन जुटाने चाहिए।
Quote 55: कठिन समय के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए।
Quote 56: कल का कार्य आज ही कर ले।
Quote 57: सुख का आधार धर्म है।
Quote 58: धर्म का आधार अर्थ अर्थात धन है।
Quote 59: अर्थ का आधार राज्य है।
Quote 60: राज्य का आधार अपनी इन्द्रियों पर विजय पाना है।
Quote 61: प्रकृति (सहज) रूप से प्रजा के संपन्न होने से नेताविहीन राज्य भी संचालित होता रहता है।
Quote 62: वृद्धजन की सेवा ही विनय का आधार है।
Quote 63: वृद्ध सेवा अर्थात ज्ञानियों की सेवा से ही ज्ञान प्राप्त होता है।
Quote 64: ज्ञान से राजा अपनी आत्मा का परिष्कार करता है, सम्पादन करता है।
Quote 65: आत्मविजयी सभी प्रकार की संपत्ति एकत्र करने में समर्थ होता है।
Quote 66: जहां लक्ष्मी (धन) का निवास होता है, वहां सहज ही सुख-सम्पदा आ जुड़ती है।
Quote 67: इन्द्रियों पर विजय का आधार विनर्मता है।
Quote 68: प्रकर्ति का कोप सभी कोपों से बड़ा होता है।
Quote 69: शासक को स्वयं योगय बनकर योगय प्रशासकों की सहायता से शासन करना चाहिए।
Quote 70: योग्य सहायकों के बिना निर्णय करना बड़ा कठिन होता है।
Quote 71: एक अकेला पहिया नहीं चला करता।
Quote 72: सुख और दुःख में सामान रूप से सहायक होना चाहिए।
Quote 73: स्वाभिमानी व्यक्ति प्रतिकूल विचारों कोसम्मुख रखकर दुबारा उन पर विचार करे।
Quote 74: अविनीत व्यक्ति को स्नेही होने पर भी मंत्रणा में नहीं रखना चाहिए।
Quote 75: शासक को स्वयं योग्य बनकर योग्य प्रशासकों की सहायता से शासन करना चाहिए।
Quote 76: सुख और दुःख में समान रूप से सहायक होना चाहिए।
Quote 77: स्वाभिमानी व्यक्ति प्रतिकूल विचारों को सम्मुख रखकर दोबारा उन पर विचार करे।
Quote 78: अविनीत व्यक्ति को स्नेही होने पर भी अपनी मंत्रणा में नहीं रखना चाहिए।
Quote 79: ज्ञानी और छल-कपट से रहित शुद्ध मन वाले व्यक्ति को ही मंत्री बनाए।
Quote 80: समस्त कार्य पूर्व मंत्रणा से करने चाहिए।
Quote 81: विचार अथवा मंत्रणा को गुप्त न रखने पर कार्य नष्ट हो जाता है।
Quote 82: लापरवाही अथवा आलस्य से भेद खुल जाता है।
Quote 83: सभी मार्गों से मंत्रणा की रक्षा करनी चाहिए।
Quote 84: मन्त्रणा की सम्पति से ही राज्य का विकास होता है।
Quote 85: मंत्रणा की गोपनीयता को सर्वोत्तम माना गया है।
Quote 86: भविष्य के अन्धकार में छिपे कार्य के लिए श्रेष्ठ मंत्रणा दीपक के समान प्रकाश देने वाली है।
Quote 87: मंत्रणा के समय कर्त्तव्य पालन में कभी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए।
मंत्रणा रूप आँखों से शत्रु के छिद्रों अर्थात उसकी कमजोरियों को देखा-परखा जाता है।
राजा, गुप्तचर और मंत्री तीनो का एक मत होना किसी भी मंत्रणा की सफलता
कार्य-अकार्य के तत्वदर्शी ही मंत्री होने चाहिए।
Quote 91: छः कानो में पड़ने से (तीसरे व्यक्ति को पता पड़ने से) मंत्रणा का भेद खुल जाता है।
Quote 92: अप्राप्त लाभ आदि राज्यतंत्र के चार आधार है।
Quote 93: आलसी राजा अप्राप्त लाभ को प्राप्त नहीं करता।
Quote 94: आलसी राजा प्राप्त वास्तु की रक्षा करने में असमर्थ होता है।
Quote 95: आलसी राजा अपने विवेक की रक्षा नहीं कर सकता।
Quote 96: आलसी राजा की प्रशंसा उसके सेवक भी नहीं करते।
Quote 97: शक्तिशाली राजा लाभ को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।
Quote 98: राज्यतंत्र को ही नीतिशास्त्र कहते है।
Quote 99: राज्यतंत्र से संबंधित घरेलु और बाह्य, दोनों कर्तव्यों को राजतंत्र का अंग कहा जाता है।
Quote 100: राज्य नीति का संबंध केवल अपने राज्य को सम्रद्धि प्रदान करने वाले मामलो से होता है।
Quote 2: वन की अग्नि चन्दन की लकड़ी को भी जला देती है अर्थात दुष्ट व्यक्ति किसी का भी अहित कर सकते है।
Quote 3: शत्रु की दुर्बलता जानने तक उसे अपना मित्र बनाए रखें।
Quote 4: सिंह भूखा होने पर भी तिनका नहीं खाता।
Quote 5: एक ही देश के दो शत्रु परस्पर मित्र होते है।
Quote 6: आपातकाल में स्नेह करने वाला ही मित्र होता है।
Quote 7: मित्रों के संग्रह से बल प्राप्त होता है।
Quote 8: जो धैर्यवान नहीं है, उसका न वर्तमान है न भविष्य।
Quote 9: संकट में बुद्धि ही काम आती है।
Quote 10: लोहे को लोहे से ही काटना चाहिए।
Quote 11: यदि माता दुष्ट है तो उसे भी त्याग देना चाहिए।
Quote 12: यदि स्वयं के हाथ में विष फ़ैल रहा है तो उसे काट देना चाहिए।
Quote 13: सांप को दूध पिलाने से विष ही बढ़ता है, न की अमृत।
Quote 14: एक बिगड़ैल गाय सौ कुत्तों से ज्यादा श्रेष्ठ है। अर्थात एक विपरीत स्वाभाव का परम हितैषी व्यक्ति, उन सौ लोगों से श्रेष्ठ है जो आपकी चापलूसी करते है।
Quote 15: कल के मोर से आज का कबूतर भला। अर्थात संतोष सब बड़ा धन है।
Quote 16: आग सिर में स्थापित करने पर भी जलाती है। अर्थात दुष्ट व्यक्ति का कितना भी सम्मान कर लें, वह सदा दुःख ही देता है।
Quote 17: अन्न के सिवाय कोई दूसरा धन नहीं है।
Quote 18: भूख के समान कोई दूसरा शत्रु नहीं है।
Quote 19: विद्या ही निर्धन का धन है।
Quote 20: विद्या को चोर भी नहीं चुरा सकता।
Quote 21: शत्रु के गुण को भी ग्रहण करना चाहिए।
Quote 22: अपने स्थान पर बने रहने से ही मनुष्य पूजा जाता है।
Quote 23: सभी प्रकार के भय से बदनामी का भय सबसे बड़ा होता है।
Quote 24: किसी लक्ष्य की सिद्धि में कभी शत्रु का साथ न करें।
Quote 25: आलसी का न वर्तमान होता है, न भविष्य।
Quote 26: सोने के साथ मिलकर चांदी भी सोने जैसी दिखाई पड़ती है अर्थात सत्संग का प्रभाव मनुष्य पर अवश्य पड़ता है।
Quote 27: ढेकुली नीचे सिर झुकाकर ही कुँए से जल निकालती है। अर्थात कपटी या पापी व्यक्ति सदैव मधुर वचन बोलकर अपना काम निकालते है।
Quote 28: सत्य भी यदि अनुचित है तो उसे नहीं कहना चाहिए।
Quote 29: समय का ध्यान नहीं रखने वाला व्यक्ति अपने जीवन में निर्विघ्न नहीं रहता।
Quote 30: जो जिस कार्ये में कुशल हो उसे उसी कार्ये में लगना चाहिए।
Quote 31: दोषहीन कार्यों का होना दुर्लभ होता है।
Quote 32: किसी भी कार्य में पल भर का भी विलम्ब न करें।
Quote 33: चंचल चित वाले के कार्य कभी समाप्त नहीं होते।
Quote 34: पहले निश्चय करिएँ, फिर कार्य आरम्भ करें।
Quote 35: भाग्य पुरुषार्थी के पीछे चलता है।
Quote 36: अर्थ, धर्म और कर्म का आधार है।
Quote 37: शत्रु दण्डनीति के ही योग्य है।
Quote 38: कठोर वाणी अग्निदाह से भी अधिक तीव्र दुःख पहुंचाती है।
Quote 39: व्यसनी व्यक्ति कभी सफल नहीं हो सकता।
Quote 40: शक्तिशाली शत्रु को कमजोर समझकर ही उस पर आक्रमण करे।
Quote 41: अपने से अधिक शक्तिशाली और समान बल वाले से शत्रुता न करे।
Quote 42: मंत्रणा को गुप्त रखने से ही कार्य सिद्ध होता है।
Quote 43: योग्य सहायकों के बिना निर्णय करना बड़ा कठिन होता है।
Quote 44: एक अकेला पहिया नहीं चला करता।
Quote 45: अविनीत स्वामी के होने से तो स्वामी का न होना अच्छा है।
Quote 46: जिसकी आत्मा संयमित होती है, वही आत्मविजयी होता है।
Quote 47: स्वभाव का अतिक्रमण अत्यंत कठिन है।
Quote 48: धूर्त व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की सेवा करते हैं।
Quote 49: कल की हज़ार कौड़ियों से आज की एक कौड़ी भली। अर्थात संतोष सबसे बड़ा धन है।
Quote 50: दुष्ट स्त्री बुद्धिमान व्यक्ति के शरीर को भी निर्बल बना देती है।
चाणक्य (Chanakya)
Quote 51: आग में आग नहीं डालनी चाहिए। अर्थात क्रोधी व्यक्ति को अधिक क्रोध नहीं दिलाना चाहिए।
Quote 52: मनुष्य की वाणी ही विष और अमृत की खान है।
Quote 53: दुष्ट की मित्रता से शत्रु की मित्रता अच्छी होती है।
Quote 54: दूध के लिए हथिनी पालने की जरुरत नहीं होती। अर्थात आवश्कयता के अनुसार साधन जुटाने चाहिए।
Quote 55: कठिन समय के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए।
Quote 56: कल का कार्य आज ही कर ले।
Quote 57: सुख का आधार धर्म है।
Quote 58: धर्म का आधार अर्थ अर्थात धन है।
Quote 59: अर्थ का आधार राज्य है।
Quote 60: राज्य का आधार अपनी इन्द्रियों पर विजय पाना है।
Quote 61: प्रकृति (सहज) रूप से प्रजा के संपन्न होने से नेताविहीन राज्य भी संचालित होता रहता है।
Quote 62: वृद्धजन की सेवा ही विनय का आधार है।
Quote 63: वृद्ध सेवा अर्थात ज्ञानियों की सेवा से ही ज्ञान प्राप्त होता है।
Quote 64: ज्ञान से राजा अपनी आत्मा का परिष्कार करता है, सम्पादन करता है।
Quote 65: आत्मविजयी सभी प्रकार की संपत्ति एकत्र करने में समर्थ होता है।
Quote 66: जहां लक्ष्मी (धन) का निवास होता है, वहां सहज ही सुख-सम्पदा आ जुड़ती है।
Quote 67: इन्द्रियों पर विजय का आधार विनर्मता है।
Quote 68: प्रकर्ति का कोप सभी कोपों से बड़ा होता है।
Quote 69: शासक को स्वयं योगय बनकर योगय प्रशासकों की सहायता से शासन करना चाहिए।
Quote 70: योग्य सहायकों के बिना निर्णय करना बड़ा कठिन होता है।
Quote 71: एक अकेला पहिया नहीं चला करता।
Quote 72: सुख और दुःख में सामान रूप से सहायक होना चाहिए।
Quote 73: स्वाभिमानी व्यक्ति प्रतिकूल विचारों कोसम्मुख रखकर दुबारा उन पर विचार करे।
Quote 74: अविनीत व्यक्ति को स्नेही होने पर भी मंत्रणा में नहीं रखना चाहिए।
Quote 75: शासक को स्वयं योग्य बनकर योग्य प्रशासकों की सहायता से शासन करना चाहिए।
Quote 76: सुख और दुःख में समान रूप से सहायक होना चाहिए।
Quote 77: स्वाभिमानी व्यक्ति प्रतिकूल विचारों को सम्मुख रखकर दोबारा उन पर विचार करे।
Quote 78: अविनीत व्यक्ति को स्नेही होने पर भी अपनी मंत्रणा में नहीं रखना चाहिए।
Quote 79: ज्ञानी और छल-कपट से रहित शुद्ध मन वाले व्यक्ति को ही मंत्री बनाए।
Quote 80: समस्त कार्य पूर्व मंत्रणा से करने चाहिए।
Quote 81: विचार अथवा मंत्रणा को गुप्त न रखने पर कार्य नष्ट हो जाता है।
Quote 82: लापरवाही अथवा आलस्य से भेद खुल जाता है।
Quote 83: सभी मार्गों से मंत्रणा की रक्षा करनी चाहिए।
Quote 84: मन्त्रणा की सम्पति से ही राज्य का विकास होता है।
Quote 85: मंत्रणा की गोपनीयता को सर्वोत्तम माना गया है।
Quote 86: भविष्य के अन्धकार में छिपे कार्य के लिए श्रेष्ठ मंत्रणा दीपक के समान प्रकाश देने वाली है।
Quote 87: मंत्रणा के समय कर्त्तव्य पालन में कभी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए।
मंत्रणा रूप आँखों से शत्रु के छिद्रों अर्थात उसकी कमजोरियों को देखा-परखा जाता है।
राजा, गुप्तचर और मंत्री तीनो का एक मत होना किसी भी मंत्रणा की सफलता
कार्य-अकार्य के तत्वदर्शी ही मंत्री होने चाहिए।
Quote 91: छः कानो में पड़ने से (तीसरे व्यक्ति को पता पड़ने से) मंत्रणा का भेद खुल जाता है।
Quote 92: अप्राप्त लाभ आदि राज्यतंत्र के चार आधार है।
Quote 93: आलसी राजा अप्राप्त लाभ को प्राप्त नहीं करता।
Quote 94: आलसी राजा प्राप्त वास्तु की रक्षा करने में असमर्थ होता है।
Quote 95: आलसी राजा अपने विवेक की रक्षा नहीं कर सकता।
Quote 96: आलसी राजा की प्रशंसा उसके सेवक भी नहीं करते।
Quote 97: शक्तिशाली राजा लाभ को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।
Quote 98: राज्यतंत्र को ही नीतिशास्त्र कहते है।
Quote 99: राज्यतंत्र से संबंधित घरेलु और बाह्य, दोनों कर्तव्यों को राजतंत्र का अंग कहा जाता है।
Quote 100: राज्य नीति का संबंध केवल अपने राज्य को सम्रद्धि प्रदान करने वाले मामलो से होता है।
बुधवार, 23 सितंबर 2015
|| एक कडवा सच ||
परम सम्मानीय भाई स्वर्गीय राजीव दीक्षित जी अपने व्याख्यान में हमेशा ये कहते थे कि 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वराज्य से परिपूर्ण आजादी हासिल नहीं हुई थी। उसे अंग्रेजों की गुलामी से पूर्णतः मुक्ति भी नहीं मिली थी, सिर्फ पंडित नेहरु और लोर्ड माउन्ट बेटन के बीच में सत्ता के हस्तांतरण की संधि भर हुई थी। ये ठीक वैसा ही था, जैसे चुनाव के बाद पुराना प्रधानमंत्री नए प्रधानमंत्री को संविधान का पालन करने की शर्त के साथ सत्ता सौप देता है। 14 अगस्त 1947 की रात को 12 बजे लार्ड माउन्ट बेटन ने अपनी सत्ता पंडित नेहरु के हाथ में कुछ शर्तों के साथ सौपी थी। सबसे बड़ी शर्त थी, भारत और पाकिस्तान का बंटवारा। ये दोनों इंडिपेंडेंट नेशन (स्वतंत्र राष्ट्र) नहीं बल्कि डोमिनियन स्टेट्स (एक बड़े राज्य के अधीन छोटे राज्य) घोषित किये गए।
अंग्रेजों की संसद ने कुछ शर्तों के साथ ‘इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट’ (भारत के स्वतंत्रता का कानून) पारित किया था। ये एक बहुत बड़ा कड़वा सत्य है कि लम्बे समय तक चली भारत की आजादी की लड़ाई में करोड़ों देशभक्तों की कुर्बानी देने के वावजूद भी हमने अंग्रेजों से आजादी छीनी नहीं थी, बल्कि अंग्रेजी सरकार ने कुछ शर्तों के साथ हमें सत्ता सौपी थी। अंग्रेजों की कुटिल चालाकी के अनुसार इसका सीधा सा अर्थ है कि अंग्रेजों ने अपना राज हमको सौंपा है ताकि हम लोग कुछ दिन इसे चला लें और यदि न चला पाये तो वो दुबारा देश पर कब्जा जमाने आ सकते हैं। आप जरा गहराई से सोचिये कि हमारे देश पर कई दशकों तक अवैध और बर्बर ढंग से कब्जा जमाने वाली अंग्रेज सरकार और उसकी संसद कौन होती है हमें आजादी देने वाली?
इसी बात को लेकर गांधी जी की बेहद नाराजगी का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई की नीव रखने वाले और उस समय की भारतीय राजनीती के सबसे बड़े पुरोधा गांधी जी 14अगस्त 1947 की रात को दिल्ली में नहीं थे। गाँधी जी ने नोआखाली से जो प्रेस विज्ञप्ति जारी की थी, उसपर जरा गौर कीजिये- “मै हिन्दुस्तान के उन करोडो लोगों को ये सन्देश देना चाहता हूँ कि ये जो तथाकथित आजादी आ रही है, ये मै नहीं लाया। ये सत्ता के लालची लोग सत्ता के हस्तांतरण के चक्कर में फंस कर लाये है। मै मानता नहीं कि इस देश में कोई आजादी आई है।” ग़ांधी जी की दिली नाराजगी और सत्ता के हस्तांतरण की संधि से उनके दिल को लगी ठेस उनकी इस प्रेस विज्ञप्ति में साफ़ झलकती है।
इस संधि का कमाल ही है कि ‘कामनवेल्थ नेशंस’ के तहत ब्रिटेन की महारानी आज भी भारत की नागरिक हैं और ब्रिटेन का उपनिवेश रह चुके भारत जैसे 71 देशों में वो बिना वीजा के जा सकती हैं, जबकि हमारे देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बिना बीजा के ब्रिटेन नहीं जा सकते हैं। भारत में सिर्फ नए बने राष्ट्रपति को 21तोपों की सलामी दी जाती है, उसके अलावा अन्य किसी को भी नहीं। लेकिन ब्रिटेन की महारानी जब भी भारत आती हैं तो उन्हें 21 तोपों की सलामी दी जाती है, इसका क्या मतलब है? क्या ब्रिटेन की महारानी भारत की नागरिक हैं या फिर भारत आज भी ब्रिटेन का उपनिवेश है? क्या ‘कामनवेल्थ नेशंस’ आज भी ब्रिटेन की रानी की समान सम्पति हैं? ये सब यही दर्शाता है कि हम आज भी मानसिक रूप से अंग्रेजों के गुलाम हैं।
भारत का नाम इंडिया अंग्रेजों द्वारा सन 1702 में पूर्वी भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से बनाई गई ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ की कुटिल और बर्बर नीतियों की याद दिलाता है। जिसने रिश्वत और धोखा देकर, जनता पर बेहद क्रूर अत्याचार करके तथा ‘फूट डालो राज करो’ की कुटिल नीति अपनाकर कई देशों में सदियों तक राज किया। आजादी के बाद हम इंडिया नाम से छुटकारा पा सकते थे, परन्तु ये अंग्रेजों से हुई संधि का ही दबाब था कि ये भारत के जगह इंडिया हो गया। अंगेज ‘वन्दे मातरम’ गीत से नफरत करते थे, क्योंकि उन्हें इसमें समाहित असीम देशभक्ति की भावना पसंद नहीं थी। अंग्रेजों के रचे दुष्चक्र का ही परिणाम था कि आजादी पाने के बाद भी हम पचास वरसों तक अपने देश की संसद में इस राष्ट्रगीत को नहीं गा सके।
आपको ये जानकर हैरत होगी कि सत्ता हस्तांतरण संधि की शर्तों के अनुसार सुभाष चन्द्र बोस जी को जिन्दा या मुर्दा अंग्रेजों के हवाले करना था। भारत के इस महान स्वतंत्रता सेनानी की घर वापसी का रास्ता ही अंग्रेजों ने बंद कर दिया था। सत्ता पाने के लालच में हमारे देश के रहनुमा इसके खिलाफ एक शब्द नहीं बोल पाये। सुभाष चन्द्र बोस जी ने आजाद हिंद फौज बनाई थी और १९४२ में हुए द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अंग्रेजो के दुश्मन जर्मन और जापानी की बहुत मदद की थी। आजाद हिंद फौज ने अंग्रेजों को बहुत ज्यादा नुकसान पहुँचाया था। अपने ही देश के लिए बेगाने हो चुके नेता जी कब कहाँ शरीर छोड़े, यह ठीक ठीक आज तक पता नहीं चला। अंगेजों के अनुसार अनुसार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकुल्लाह, रामप्रसाद विस्मिल जैसे महान क्रांतिकारी आतंकवादी थे और आजादी के बाद भी बहुत दिनों तक यही हमारे स्कूलों में पढाया जाता था।
राष्ट्रभाषा हिंदी का विकास अंगेज ही अवरुद्ध करके गए। सन १९४० में लोर्ड मैकोले ने कहा था कि “हिंदी भाषा भारत की रीढ़ की हड्डी है और हमें इसे तोडना है।” उसने भारतीय शिक्षा व्यस्था का अंग्रेजीकरण किया और आविष्कार या रिसर्च की जगह महज डिग्री बांटना उसका मुख्य उद्देश्य बनाया। अंग्रेजों ने भारत में लम्बे समय तक राज करने और भारतियों के मन में भाषा को लेकर फूट डालने के मकसद से देश की आधिकारिक भाषा को अंग्रेजी बनाया, जो आज भी है। इतना ही नहीं बल्कि अंग्रेजों के बनाये बहुत से कानून देश में आज भी लागू हैं। भाई राजीव दीक्षित जी के अनुसार, “सत्ता हस्तांतरण की संधि की शर्तों के अनुसार अंग्रेज देश छोड़ के चले जायेगे लेकिन इस देश में कोई भी कानून चाहे वो किसी क्षेत्र में हो नहीं बदला जायेगा। इसलिए आज भी इस देश में ३४७३५ कानून वैसे के वैसे चल रहे हैं जैसे अंग्रेजों के समय चलता था।”
अंगर्जों ने यह भी शर्त रखी थी कि उनके समय में स्थापित १२६ विदेशी कंपनियां भारत में रहकर अपना कारोबार करेंगी और सरकार उन्हें पूरा संरक्षण देगी। ये विदेशी कपनिया आज भी भारत को आजादी से पहले की ही भांति बेरोक टोक लूट-खसोट रही है। इस संधि के अनुसार अंग्रेजों द्वारा बनाये गए भवन जैसे के तैसे रखे जायेंगे | शहर का नाम, सड़क का नाम सब के सब वैसे ही रखे जायेंगे। देश में आज भी लार्ड डलहौजी के नाम पर डलहौजी शहर है। रिपन रोड, कर्जन रोड, मेयो रोड, बेंटिक रोड, फ्रेजर रोड, बेली रोड सहित देशभर में ऐसे हजारों भवन और रोड हैं, जो सब के सब वैसे के वैसे ही हैं, जैसे अंग्रेजों के समय में थे। आज भी देश के हर बड़े शहर में कोई न कोई भवन या सड़क अंग्रेजों के नाम से रखे मिल जायेंगे। कितने शर्म की बात है कि इन अंग्रेजों ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति के साथ साथ हमारे सदियों पुराने आयर्वेद और गुरुकुल शिक्षा पद्धति को पूरी तरह से तहस नहस कर दिया था और हम आज भी उन दुष्टों को याद रख्रे हुए हैं।
दरअसल अंग्रेजों का गुणगान करने और उन्हें देशभर में महिमामंडित करने में आज़ादी के समय के हमारे कुछ बड़े नेताओं का बहुत बड़ा हाथ था। पंडित नेहरू जैसे नेता देखने में ही भारतीय थे लेकिन मन, कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे। उनके लिए तो अंग्रेजों की शिक्षा व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, चिकित्सा व्यवस्था, कृषि व्यवस्था, न्याय व्यवस्था और कानून व्यवस्था सब आदर्शमय थी, इसलिए उन्होंने स्वदेशी नीति बनाने की जगह अंग्रेजों की बनाई हुई सब व्यवस्था लागू कर दी, जो किसी भी दृष्टि से हमारे देश के अनुकूल नहीं है। भाजपा जैसी देशभक्त पार्टी और राष्ट्रवादी मोदी सरकार को इन सब चीजों का संज्ञान लेना चाहिए और अंग्रेजों से पूर्णरूपेण छुटकारा पाने का प्रयास करना चाहिए, तभी हमारी आधी अधूरी आजादी पूरी होगी। अंत में भारत रत्न से सम्मानित हमारे देश के महान नेता और भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की रचित एक कविता ‘आजादी अभी अधूरी है’ की कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं-
बस इसीलिए तो कहता हूँ आज़ादी अभी अधूरी है।
कैसे उल्लास मनाऊँ मैं? थोड़े दिन की मजबूरी है॥
दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुनः अखंड बनाएँगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक आजादी पर्व मनाएँगे॥
उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें।
जय हिंद जय भारत
अंग्रेजों की संसद ने कुछ शर्तों के साथ ‘इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट’ (भारत के स्वतंत्रता का कानून) पारित किया था। ये एक बहुत बड़ा कड़वा सत्य है कि लम्बे समय तक चली भारत की आजादी की लड़ाई में करोड़ों देशभक्तों की कुर्बानी देने के वावजूद भी हमने अंग्रेजों से आजादी छीनी नहीं थी, बल्कि अंग्रेजी सरकार ने कुछ शर्तों के साथ हमें सत्ता सौपी थी। अंग्रेजों की कुटिल चालाकी के अनुसार इसका सीधा सा अर्थ है कि अंग्रेजों ने अपना राज हमको सौंपा है ताकि हम लोग कुछ दिन इसे चला लें और यदि न चला पाये तो वो दुबारा देश पर कब्जा जमाने आ सकते हैं। आप जरा गहराई से सोचिये कि हमारे देश पर कई दशकों तक अवैध और बर्बर ढंग से कब्जा जमाने वाली अंग्रेज सरकार और उसकी संसद कौन होती है हमें आजादी देने वाली?
इसी बात को लेकर गांधी जी की बेहद नाराजगी का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई की नीव रखने वाले और उस समय की भारतीय राजनीती के सबसे बड़े पुरोधा गांधी जी 14अगस्त 1947 की रात को दिल्ली में नहीं थे। गाँधी जी ने नोआखाली से जो प्रेस विज्ञप्ति जारी की थी, उसपर जरा गौर कीजिये- “मै हिन्दुस्तान के उन करोडो लोगों को ये सन्देश देना चाहता हूँ कि ये जो तथाकथित आजादी आ रही है, ये मै नहीं लाया। ये सत्ता के लालची लोग सत्ता के हस्तांतरण के चक्कर में फंस कर लाये है। मै मानता नहीं कि इस देश में कोई आजादी आई है।” ग़ांधी जी की दिली नाराजगी और सत्ता के हस्तांतरण की संधि से उनके दिल को लगी ठेस उनकी इस प्रेस विज्ञप्ति में साफ़ झलकती है।
इस संधि का कमाल ही है कि ‘कामनवेल्थ नेशंस’ के तहत ब्रिटेन की महारानी आज भी भारत की नागरिक हैं और ब्रिटेन का उपनिवेश रह चुके भारत जैसे 71 देशों में वो बिना वीजा के जा सकती हैं, जबकि हमारे देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बिना बीजा के ब्रिटेन नहीं जा सकते हैं। भारत में सिर्फ नए बने राष्ट्रपति को 21तोपों की सलामी दी जाती है, उसके अलावा अन्य किसी को भी नहीं। लेकिन ब्रिटेन की महारानी जब भी भारत आती हैं तो उन्हें 21 तोपों की सलामी दी जाती है, इसका क्या मतलब है? क्या ब्रिटेन की महारानी भारत की नागरिक हैं या फिर भारत आज भी ब्रिटेन का उपनिवेश है? क्या ‘कामनवेल्थ नेशंस’ आज भी ब्रिटेन की रानी की समान सम्पति हैं? ये सब यही दर्शाता है कि हम आज भी मानसिक रूप से अंग्रेजों के गुलाम हैं।
भारत का नाम इंडिया अंग्रेजों द्वारा सन 1702 में पूर्वी भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से बनाई गई ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ की कुटिल और बर्बर नीतियों की याद दिलाता है। जिसने रिश्वत और धोखा देकर, जनता पर बेहद क्रूर अत्याचार करके तथा ‘फूट डालो राज करो’ की कुटिल नीति अपनाकर कई देशों में सदियों तक राज किया। आजादी के बाद हम इंडिया नाम से छुटकारा पा सकते थे, परन्तु ये अंग्रेजों से हुई संधि का ही दबाब था कि ये भारत के जगह इंडिया हो गया। अंगेज ‘वन्दे मातरम’ गीत से नफरत करते थे, क्योंकि उन्हें इसमें समाहित असीम देशभक्ति की भावना पसंद नहीं थी। अंग्रेजों के रचे दुष्चक्र का ही परिणाम था कि आजादी पाने के बाद भी हम पचास वरसों तक अपने देश की संसद में इस राष्ट्रगीत को नहीं गा सके।
आपको ये जानकर हैरत होगी कि सत्ता हस्तांतरण संधि की शर्तों के अनुसार सुभाष चन्द्र बोस जी को जिन्दा या मुर्दा अंग्रेजों के हवाले करना था। भारत के इस महान स्वतंत्रता सेनानी की घर वापसी का रास्ता ही अंग्रेजों ने बंद कर दिया था। सत्ता पाने के लालच में हमारे देश के रहनुमा इसके खिलाफ एक शब्द नहीं बोल पाये। सुभाष चन्द्र बोस जी ने आजाद हिंद फौज बनाई थी और १९४२ में हुए द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अंग्रेजो के दुश्मन जर्मन और जापानी की बहुत मदद की थी। आजाद हिंद फौज ने अंग्रेजों को बहुत ज्यादा नुकसान पहुँचाया था। अपने ही देश के लिए बेगाने हो चुके नेता जी कब कहाँ शरीर छोड़े, यह ठीक ठीक आज तक पता नहीं चला। अंगेजों के अनुसार अनुसार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकुल्लाह, रामप्रसाद विस्मिल जैसे महान क्रांतिकारी आतंकवादी थे और आजादी के बाद भी बहुत दिनों तक यही हमारे स्कूलों में पढाया जाता था।
राष्ट्रभाषा हिंदी का विकास अंगेज ही अवरुद्ध करके गए। सन १९४० में लोर्ड मैकोले ने कहा था कि “हिंदी भाषा भारत की रीढ़ की हड्डी है और हमें इसे तोडना है।” उसने भारतीय शिक्षा व्यस्था का अंग्रेजीकरण किया और आविष्कार या रिसर्च की जगह महज डिग्री बांटना उसका मुख्य उद्देश्य बनाया। अंग्रेजों ने भारत में लम्बे समय तक राज करने और भारतियों के मन में भाषा को लेकर फूट डालने के मकसद से देश की आधिकारिक भाषा को अंग्रेजी बनाया, जो आज भी है। इतना ही नहीं बल्कि अंग्रेजों के बनाये बहुत से कानून देश में आज भी लागू हैं। भाई राजीव दीक्षित जी के अनुसार, “सत्ता हस्तांतरण की संधि की शर्तों के अनुसार अंग्रेज देश छोड़ के चले जायेगे लेकिन इस देश में कोई भी कानून चाहे वो किसी क्षेत्र में हो नहीं बदला जायेगा। इसलिए आज भी इस देश में ३४७३५ कानून वैसे के वैसे चल रहे हैं जैसे अंग्रेजों के समय चलता था।”
अंगर्जों ने यह भी शर्त रखी थी कि उनके समय में स्थापित १२६ विदेशी कंपनियां भारत में रहकर अपना कारोबार करेंगी और सरकार उन्हें पूरा संरक्षण देगी। ये विदेशी कपनिया आज भी भारत को आजादी से पहले की ही भांति बेरोक टोक लूट-खसोट रही है। इस संधि के अनुसार अंग्रेजों द्वारा बनाये गए भवन जैसे के तैसे रखे जायेंगे | शहर का नाम, सड़क का नाम सब के सब वैसे ही रखे जायेंगे। देश में आज भी लार्ड डलहौजी के नाम पर डलहौजी शहर है। रिपन रोड, कर्जन रोड, मेयो रोड, बेंटिक रोड, फ्रेजर रोड, बेली रोड सहित देशभर में ऐसे हजारों भवन और रोड हैं, जो सब के सब वैसे के वैसे ही हैं, जैसे अंग्रेजों के समय में थे। आज भी देश के हर बड़े शहर में कोई न कोई भवन या सड़क अंग्रेजों के नाम से रखे मिल जायेंगे। कितने शर्म की बात है कि इन अंग्रेजों ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति के साथ साथ हमारे सदियों पुराने आयर्वेद और गुरुकुल शिक्षा पद्धति को पूरी तरह से तहस नहस कर दिया था और हम आज भी उन दुष्टों को याद रख्रे हुए हैं।
दरअसल अंग्रेजों का गुणगान करने और उन्हें देशभर में महिमामंडित करने में आज़ादी के समय के हमारे कुछ बड़े नेताओं का बहुत बड़ा हाथ था। पंडित नेहरू जैसे नेता देखने में ही भारतीय थे लेकिन मन, कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे। उनके लिए तो अंग्रेजों की शिक्षा व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, चिकित्सा व्यवस्था, कृषि व्यवस्था, न्याय व्यवस्था और कानून व्यवस्था सब आदर्शमय थी, इसलिए उन्होंने स्वदेशी नीति बनाने की जगह अंग्रेजों की बनाई हुई सब व्यवस्था लागू कर दी, जो किसी भी दृष्टि से हमारे देश के अनुकूल नहीं है। भाजपा जैसी देशभक्त पार्टी और राष्ट्रवादी मोदी सरकार को इन सब चीजों का संज्ञान लेना चाहिए और अंग्रेजों से पूर्णरूपेण छुटकारा पाने का प्रयास करना चाहिए, तभी हमारी आधी अधूरी आजादी पूरी होगी। अंत में भारत रत्न से सम्मानित हमारे देश के महान नेता और भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की रचित एक कविता ‘आजादी अभी अधूरी है’ की कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं-
बस इसीलिए तो कहता हूँ आज़ादी अभी अधूरी है।
कैसे उल्लास मनाऊँ मैं? थोड़े दिन की मजबूरी है॥
दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुनः अखंड बनाएँगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक आजादी पर्व मनाएँगे॥
उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें।
जय हिंद जय भारत
शनिवार, 22 अगस्त 2015
|| बिखरती हमारी संस्कृति ||
बदलल गाँव क सूरत
ओक्का बोक्का तीन तलोक्का
फूट गयल बुढ़ऊ क हुक्का
फगुआ कजरी कहाँ हेरायल
अब त गाँव क गांव चुडुक्का
नया जमाना नयके लोग
नया नया कुल फैलल रोग
एक्के बात समझ में आवै
जइसन करनी वइसन भोग
नई नई कुल फैलल पूजा
नया नया कुल देवी देवता
एक्कै घरे में पांच ठो चूल्हा
एक्कै घरे में पांच ठो नेवता
नउआ कउआ बार बनाउवा
कउनो घरे न फरसा झौआ
लगै पितरपख होय खोजाइ
खोजले मिलइ न कुक्कुर कउआ
बूढ़वन क चौपाल हेरायल
जोड़ी मुग्दल नाल हेरायल
हिप्पी कट क चलल जमाना
पहलवान कट बाल हेरायल
कहाँ गयल कुल बंजर ऊसर
लगत बा जइसे गांव ई दूसर
जब से ई धनकुट्टि आइल
कउनो घरे न ओखली मूसर
कहाँ बैल क घुंघरू घंटी
कहा बा पूरवट अउर इनारा
कहाँ गइल पनघट क गोरी
सूना सुना पनघट सारा
गांव गली में अब त ख़ाली राजनीती क होले चर्चा
अब ऊ होरहा कहा भुजला
कहा पिसाला नीमक मरचा
कभों कभों सोचीला भाई
अब ऊ दिन ना लौट के आई
अब ना वइसे कोयल बोलिहैं
वइसे ना महकी अमराई
हमारी संस्कृति सर्वोपरि है इसको बचाना हम सब भारतीयो का कर्तव्य बनता है |
ओक्का बोक्का तीन तलोक्का
फूट गयल बुढ़ऊ क हुक्का
फगुआ कजरी कहाँ हेरायल
अब त गाँव क गांव चुडुक्का
नया जमाना नयके लोग
नया नया कुल फैलल रोग
एक्के बात समझ में आवै
जइसन करनी वइसन भोग
नई नई कुल फैलल पूजा
नया नया कुल देवी देवता
एक्कै घरे में पांच ठो चूल्हा
एक्कै घरे में पांच ठो नेवता
नउआ कउआ बार बनाउवा
कउनो घरे न फरसा झौआ
लगै पितरपख होय खोजाइ
खोजले मिलइ न कुक्कुर कउआ
बूढ़वन क चौपाल हेरायल
जोड़ी मुग्दल नाल हेरायल
हिप्पी कट क चलल जमाना
पहलवान कट बाल हेरायल
कहाँ गयल कुल बंजर ऊसर
लगत बा जइसे गांव ई दूसर
जब से ई धनकुट्टि आइल
कउनो घरे न ओखली मूसर
कहाँ बैल क घुंघरू घंटी
कहा बा पूरवट अउर इनारा
कहाँ गइल पनघट क गोरी
सूना सुना पनघट सारा
गांव गली में अब त ख़ाली राजनीती क होले चर्चा
अब ऊ होरहा कहा भुजला
कहा पिसाला नीमक मरचा
कभों कभों सोचीला भाई
अब ऊ दिन ना लौट के आई
अब ना वइसे कोयल बोलिहैं
वइसे ना महकी अमराई
हमारी संस्कृति सर्वोपरि है इसको बचाना हम सब भारतीयो का कर्तव्य बनता है |
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